एटा

भारतेंदु युग के प्रख्यात साहित्यकार थे मुरादाबाद के ज्वाला प्रसाद मिश्र

ज्वाला प्रसाद मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर की ऑनलाइन परिचर्चा

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एटा। साहित्यिक संस्था ‘प्रगति मंगला’, एटा की ओर से “साहित्य के आलोक स्तम्भ” कार्यक्रम के तहत मुरादाबाद के प्रख्यात साहित्यकार स्मृतिशेष विद्यावारिधि ज्वाला प्रसाद मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ऑनलाइन साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया । पटल प्रशासक नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा मां सरस्वती को नमन और दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम आरम्भ हुआ। कार्यक्रम के संयोजक मुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरा‌र्द्ध में जिस समय भारतेंदु हरिश्चंद्र साहित्य रचकर हिंदी भाषियों का नेतृत्व कर रहे थे। उस समय मुरादाबाद के साहित्यकार भी उनके साथ कदम से कदम मिला रहे थे। इनमें एक उल्लेखनीय नाम है सन1862 में जन्में विद्यावारिधि पं. ज्वाला प्रसाद मिश्र का। उनकी रामायण की भाषा टीका पूरे देश में प्रसिद्ध है। उनको सुप्रसिद्ध नाटककार, कवि, व्याख्याता, अनुवादक, टीकाकार, धर्मोपदेशक, इतिहासकार के रूप में भी जाना जाता है। सन 1916 में उनका देहावसान हो गया। डॉ रस्तोगी ने उनकी अनेक रचनाएं भी प्रस्तुत कीं । अध्यक्षता करते हुए जेएलएन कालेज एटा के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष आचार्य डॉ प्रेमीराम मिश्र ने कहा कि विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता पं. ज्वाला प्रसाद मिश्र ने न केवल अनेक संस्कृत ग्रंथों की भाषा टीका करके उन्हें सरल और बोधगम्य बनाया अपितु अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना कर हिंदी साहित्य में अतुलनीय योगदान दिया।
प्रख्यात साहित्यकार यशभारती माहेश्वर तिवारी ने कहा कि पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र के कृतित्व से वे सभी लोग परिचित हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास का बारीकी से अध्ययन किया है ।भारतेंदु युग में हिंदी ब्रजभाषा,अवधी आदि से निकल कर नया रूप ग्रहण कर रही थी और मिश्र जी आधुनिक काल के उस काल खंड के एक प्रमुख रचनाकार थे । उनके द्वारा लिखी रामायण की टीका का प्रकाशन वेंकटेश्वर प्रेस बंबई से हुआ था और उसके पचास से अधिक संस्करण प्रकाशित हुए ।

प्रगति मंगला के संस्थापक बलराम सरस ( एटा) ने कहा कि भारतेन्दु युग के कवि व विराट कृतित्व के स्वामी पं. ज्वाला प्रसाद मिश्र के काव्यशास्त्र का ज्ञान स्तुत्य है। तत्कालीन सामाजिक अभिरुचि के अनुसार गीतिशैली में लिखा उनका नाटक सीता वनवास काफी लोकप्रिय हुआ। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती की विचारधारा से उनका विरोध रहा जिसके चलते उन्होंने दयानंद तिमिर भास्कर नामक 425 पृष्ठों का ग्रंथ लिखकर ख्याति प्राप्त की।

गुना(मध्य प्रदेश) की साहित्यकार नीलम कुलश्रेष्ठ ने कहा कि मुरादाबाद के प्रख्यात साहित्यकार और टीकाकार विद्यावारिधि पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी, फारसी, गुजराती, बांग्ला जैसी भाषाओं के ज्ञाता थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन साहित्य साधना एवं सनातन धर्म की संवृद्धि में लगा दिया। अनेकानेक वैदिक, पौराणिक ग्रंथों की भाषा टीकाएँ लिखीं। संस्कृत नाटकों का अनुवाद करके हिंदी को और भी समृद्ध किया। इसी कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नारायण मिश्र, क्षेम चंद सुमन, डॉ सोमनाथ गुप्ता जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने अपने अपने आलोचनात्मक ग्रंथों में उनका उल्लेख किया।

युवा कवयित्री मीनाक्षी ठाकुर (मुरादाबाद) ने कहा कि भारतेंदु जी के समकालीन और श्रेष्ठ अनुवादक, सनातन धर्म की कीर्ति ध्वजा फहराने वाले,संस्कृत के प्रकांड विद्वान तथा राग रागिनियों के ज्ञाता पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र द्वारा रचित सीता वनवास नाटक के संवाद अत्यंत रोचक व दृश्यों में जान डालने वाले हैं।

नयी दिल्ली की साहित्यकार आशा दिनकर आस ने कहा कि पंडित ज्वाला प्रसाद जी का लेखन बहुआयामी था और वह बहुभाषा के सिद्धहस्त थे | उनका लेखन और कृतित्व अतुलनीय साहित्यिक विरासत है ।

मुरादाबाद के साहित्यकार फरहत अली खान ने कहा कि साहित्य की महान विभूति पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र जी द्वारा रचित टीका ग्रन्थ जहाँ ख़ासे महत्वपूर्ण हैं, वहीं भारतेंदु के ज़माने में यानी हिंदी साहित्य के आरंभिक दौर में इन का लिखा नाटक और इन के द्वारा अनूदित दो नाटक इन को साहित्य की मुख्यधारा में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिए काफ़ी हैं, साहित्य के किसी भी विद्यार्थी के लिए ये बात सब से अहम है। फिर प्रताप नारायण मिश्र जी का लेख इन के लेखन की गुणवत्ता की सनद है।

चूँकि इन्हें संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फ़ारसी का भी अच्छा ज्ञान था, इस का प्रभाव इनके नाटकों की भाषा पर साफ़ नज़र आता है। भाषा प्रवाहमय और ज़्यादातर सरल है। मसलन- ‘लाचारी’, ‘पल’, ‘कल(आराम)’, ‘वास्ते’, ‘ज़हर’ जैसे आम-फ़हम अल्फ़ाज़ नज़र आते हैं।

मुरादाबाद के युवा रचनाकार राजीव प्रखर ने कहा कि कीर्तिशेष पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र जी एक साहित्यकार होने के साथ-साथ एक युग दृष्टा भी थे। उनकी गणना कालजयी रचनाकारों में की जाती है। जौनपुर की कवयित्री विभा तिवारी ने कहा कि ज्वाला प्रसाद मिश्र जी का लेखन,कृतित्व और व्यक्तित्व देश की विरासत है। इसके अतिरिक्त रूबी गुप्ता (कुशीनगर), विजय चतुर्वेदी विजय (आगरा), कल्पना सेन गुप्ता (असम), कृष्ण मुरारी लाल मानव ( एटा ), संजीव सारस्वत आदि ने भी विचार व्यक्त किये ।

टिहरी नरेश ने किया था सम्मानित

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मनोज रस्तोगी ने बताया पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र ने मुरादाबाद में सनातन धर्म सभा की भी स्थापना की थी। वह धर्मोपदेश के लिए पूरे देश में जाते थे। सन् 1901 में उन्हें टिहरी नरेश ने बुलाकर सम्मानित किया था। भारत धर्म महामंडल ने उन्हें विद्यावारिधि और महोपदेशक उपाधियों से सम्मानित किया था। विभिन्न रियासतों के राजाओं द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक से भी सम्मानित किया गया था।

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