आगरा

बेटी बेटा के बीच भेदभाव को करें खत्म, मिटायें कुरीतियां : डॉ सुनील उपाध्याय

liladhar pradhan 1000

 

आगरा : सुरक्षित मातृत्व सप्ताह के मौके पर सराहनीय सोच के साथ आप्टा संस्थापक/संयोजक डॉ0 सुनील उपाध्याय ने अपने कुछ विचार मीडिया के माध्यम से प्रेषित किये जिसमें कहा कि इस सृष्टि का सृजन नारी से हुआ है। जिसने इंसान को अपनी कोख से जन्म दिया है। फिर इस बात को स्वीकार करने में क्या हर्ज है कि हम सब नारी के ही अंश है। जब सृष्टि का हर जीव नारी का ही अंश है। तो इस लिहाज से हम सभी को नारी के प्रति आदर और सम्मान व्यक्त करना चाहिए। नारी मां, बेटी, बहन और ना जाने कितने रिश्ते में बटी हुई जीवन का आधार है। लेकिन आज बदलते हुई प्रवेश में मनुष्य की अहंकार और श्रेष्ठता की बलिवेदी पर नारी का बलिदान हो रहा है। भले ही हम चाहे कितना ही खुद को विकसित मान लें लेकिन समाज का एक तबका आज भी बेटियों को अभिशाप मानता है।

आज भी इन बेटियों को सामाजिक भेदभाव, दहेज, शारीरिक शोषण, अधिकारों में भेदभाव जैसे अनेक सामाजिक कुरीतियों का सामना करना पड़ता है। इन सब के बावजूद यही लड़कियां समाज में आगे बढ़ कर अपना और देश का नाम कमा रही हैं। लेकिन जरा सोचिए अगर इस धरती पर बेटियां यानी लड़कियां ही नहीं रहे तो एक समय बाद इस समाज का वंश रुक जाएगा और इस धरती पर इंसानों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जीवन के आधार को बचाने व बेटी बेटे के बीच के फर्क को दूर करने के लिए समाज में बेटी दिवस मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई है जिसका मुख्य उद्देश्य बेटी बेटा के बीच भेदभाव को खत्म करते हुए उन्हें समाज में फैली कुरीतियों से बचाना है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को गति दी ताकि समाज में बेटियों को भी बराबर अधिकार दिलाया जा सके लेकिन यह अभियान तब तक पूर्ण रूप से सफल नहीं होगा जब तक लोगों के विचार बेटियों के प्रति बदल नहीं जाते। भारत के लोग धन समृद्धि की प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी की आराधना व ज्ञान व विवेक के लिए मां सरस्वती की उपासना करते हैं। लेकिन जब यही देवियाँ बेटियों के रूप में उनके घर में जन्म लेती है तब कुछ लोगों को यह बात नागवार लगती है। ऐसी स्थिति में या तो बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है या फिर समाज में आने के बाद उनके साथ भेदभाव किया जाता है। इस पुरुष प्रधान समाज में नारी के साथ हो रहे भेदभाव को रोकने के लिए हमें शिक्षा और संस्कार के साथ साथ इंसानियत को भी समझना होगा। आओ इंसान बनकर देवी स्वरूप नारी को समाज में उसके खोए हुए गौरव को प्रदान करें और बेटी बेटे के बीच के भेदभाव को दूर करें।

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