तीर-ए-नज़र राजनीति

आखिर शिकस्त की दहलीज पर कैसे पहुंच गई अपराजित भाजपा ?ये रहे मुख्य मुद्दे

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नई दिल्ली – साल 2014 के लोकसभा चुनावों में 336 सीटों के साथ एनडीए ने धमाकेदार तरीके से सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली थी। इन सीटों में से 282 पर अकेली बीजेपी ने कब्जा किया। ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार किसी फैसले के लिए अपने सहायक दलों पर ज्यादा निर्भर नहीं रही और न ही विपक्ष के विरोध का कोई डर रहा। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि प्रधानमंत्री कुर्सी पर बैठे नरेंद्र मोदी से देश की जनता को बहुत उम्मीदें रही हैं। हालांकि नोटबंदी-जीएसटी जैसे फैसले लिए भी गए लेकिन इनका जितना स्वागत हुआ, उतनी ही आलोचना भी हुई। जमीनी स्तर पर देखा जाए तो 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी सरकार का पुरजोर समर्थन करने वालों का भी समय के साथ मोहभंग हुआ है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जनता की उम्मीदों को केंद्र ने जाने-अनजाने में ठेस जरूर पहुंचाई है। इसकी एक बानगी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजों के दौरान देखने को मिल रही है। बीजेपी द्वारा पूरी तरह से बैकफुट पर धकेली गई कांग्रेस एक बार फिर से पैर जमाती नजर आ रही है। राजस्थान में तो कांग्रेस ने जीत का जश्न भी मनाना शुरू कर दिया है, तो वहीं शिवराज के नेतृत्व में बीजेपी का गढ़ बन चुके मध्यप्रदेश में भी बीजेपी और कांग्रेस में बराबरी का मुकाबला चल रहा है। रही बात छत्तीसगढ़ की तो वहां कांग्रेस एक साफ-सुथरी जीत हासिल करती नजर आ रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि अपराजित बन चुकी बीजेपी के इस चक्रव्यूह का कांग्रेस कैसे भेदने में कामयाब हो गई। केंद्र व राज्यों की बीजेपी सरकार से कहां चूक हुई, जिसका फायदा सीधे तौर पर विपक्षी दलों को होता दिख रहा है। तो आइए जानते हैं वो 10 कारण जिन्होंने न सिर्फ मोदी लहर को झटका दिया, बल्कि कांग्रेस को फिर वापसी का मौका भी दिया है-

किसानों की नाराजगीः विगत दो-तीन सालों में किसान एक बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आए हैं। यही नहीं अब इसकी संगठित शक्ति राजनीति को भी प्रभावित करने लगी है। विधानसभा चुनावों में भी किसानों का व्यापक प्रभाव देखा गया है। ऐसे में जीत और हार को किसान वोटर काफी हद तक प्रभावित करेगा। इसके अलावा केन्द्र सरकार से किसान खासे नाराज हैं। हालांकि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी किसानों की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी, लेकिन उस सरकार ने किसानों के लिए कुछ अच्छे काम किए थे। यही करण है कि मनमोहन सिंह फिल से सत्ता में आ गए, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले तो भू-अधिग्रहण कानून में सशोधन का प्रस्ताव रखा, फिर बाद में उसे संसद में पास कराने के लिए अध्यादेश तक लाने की कोशिश। भाजपा का यह निर्णय किसानों में गलत संदेश लेकर गया और देशभर के किसानों का मूड भाजपा के खिलाफ बनने लगा। इसके बाद सरकार ने क्षतिपूर्ति मुआवजे की पूरी योजना फसल बीमा करने वाली कंपनियों को सौंप दिया। यह किसानों को एक प्रकार से गुलाम बनाने वाली बात हो गई। यह भी किसानों के हित में नहीं गया और किसान नाराज होते चले गए। एक आंकड़े में बताया गया है कि किसानों के आत्महत्या करने का दर मोदी सरकार में कई गुणा बढ़ गई है। किसान खेती छोड़ रहे हैं। ऐसे में बीजेपी के वोट बैेंक में लगी सेंध का एक मुख्य कारण किसानों को माना जा रहा है।

नोटबंदी का असरः सत्ता में आने के बाद से अबतक मोदी सरकार का सबसे बड़ा फैसला नोटबंदी रहा है। नोटबंदी ने पूरे देश को बैंकों से सामने खड़ा कर दिया। इसके बाद आम लोगों की बेहद परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन कुछ अच्छे परिणाम मिलने की उम्मीद में आम जनता ने खुद को आने वाली दिक्कतों को कड़वा घूंट समझकर पी लिया। लेकिन इन अच्छे नतीजों को आज भी जनता टकटकी लगाए देख रही है। जमीनी स्तर की बात करें तो नोटबंदी के चलते सबसे ज्यादा परेशानी आम जनता को हुई और उम्मीदें भी इस वर्ग को अधिक थीं, लेकिन सरकार नोटबंदी से हुए फायदों के मुद्दे पर अभी तक न तो कई संतुष्ट करने वाला जवाब दे पाई और न ही आम आदमी को इससे कुछ फायदा होता दिखा।

  

एससी-एसटी एक्टः विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरने का एक मुख्य कारण एससी-एसटी एक्ट भी है। बलिया के बैरिया से भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह ने भी हाल ही में ये बात स्वीकार की थी कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी हारती है तो इसे एससी-एसटी एक्ट का प्रभाव माना जाएगा।  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम और इमान पर भले हम जुट जाएंगे लेकिन यदि हार होती है तो निश्चित ही एससी-एसटी एक्ट के चलते होगी। विधायक ने कहा कि दलित भी हमारा भाई है लेकिन सवर्णो का अपमान करके दलित को आसमान पर चढ़ाना कही से प्रासंगिक नहीं है। सबका सम्मान करना चाहिए। इसलिए यदि परिणाम हमारे पक्ष में नहीं आया तो निश्चित रूप से उसके पीछे वजह एससी-एसटी एक्ट होगा।

राम मंदिरः जिन मुद्दों के साथ मोदी सरकार और यूपी की योगी सरकार सत्ता में आई है उनमें राम मंदिर सबसे पुराना है। लेकिन इस बार लोगों की उम्मीदें पहले से अधिक थीं, क्योंकि केंद्र में मोदी और यूपी में योगी दो ऐसे चेहरे थें, जिनपर कट्टर हिन्दूवादी होना का टैग सत्ता में आने से पहले लगा हुआ था। लेकिन अभी भी राम मंदिर के मुद्दे पर स्थिति जस की तस बनी हुई है और आलम ये है कि अब आरएसएस, बीएचपी जैसे संगठनों को आगे आना पड़ा है। इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में धर्म-सभाएं भी हो रही हैं। लेकिन कहीं न कहीं इस मुद्दे का समाधान न निकालकर मोदी सरकार अपने ही बिछाए जाल में फंसती नजर आ रही है और इससे मंदिर समर्थक वोटरों का पार्टी को शिकार होना पड़ा है।  

जीएसटीः देश के हर हिस्से में व्यापारी केंद्र की ओर से लागू जीएसटी प्रणाली से परेशान है। ऐसा इसलिए क्योंकि जीएसटी की वजह से इन व्यापारियों को एक रुपये का सामान बेचने का भी पूरा हिसाब-किताब रखना पड़ता है। हर महीने तीन रिटर्न फॉर्म दाखिल करने से उनका खर्चा काफी बढ़ गया है। ऐसे में देश के छोटे व मध्यम वर्ग के उद्योगपतियों की आमदनी पर तो असर हुआ, लेकिन साथ ही उनकी परेशानियों में भी इजाफा हुआ है। विधानसभा चुनावों में अगर बीजेपी का प्रदर्शन स्तर पहले के मुकाबले गिरा है तो उसके पीछे जीएसटी एक मुख्य कारण माना जा सकता है।

केंद्र की स्वतंत्र संस्थाओं के साथ टकरावः बात चाहे सुप्रीम कोर्ट की हो, सीबीआई की हो या आरबीआई की, देश की इन तीन बड़ी सस्थाओं में केंद्र सरकार के बढ़ रहे हस्तक्षेप ने केंद्र सरकार की विश्वसनीयता को जनता के बीच कम किया है। पहली बार ऐसा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों ने खुलेआम प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बताया की देश की सबसे बड़ी अदालत में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। इस घटना ने न्यायपालिका पर भरोसा रखने वाले आम आदमी को एक बड़ा झटका दिया था और केंद्र को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। वहीं सीबीआई में मचा घमासान भी अभी तक थमा नहीं है।  जांच एजेंसी के दो बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा का विवाद अभी भी कोर्ट में है और इसके तार भी केंद्र सरकार से जुड़े बताए जा रहे हैं। वहीं आरबीआई और सरकार के बीच की लड़ाई तो किसी से छिपी नहीं है। केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता सहित कुछ मुद्दों को लेकर सरकार के साथ मतभेद की खबरों के बीच आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया। बता दें कि पिछले कुछ महीनों से सरकार और आरबीआई के बीच जबरदस्त टकराव चल रहा था, जिसके बाद गवर्नर उर्जित पटेल को बार-बार सरकार को जवाब देना पड़ रहा था। कर्ज में डूबते सरकारी बैंकों, तेल की बढ़ती कीमतों और लुढ़कते रुपया से लेकर घाटे में जा रही फाइनेंस कंपनियों जैसी नाकामियों का ठिकरा सरकार और आरबीआई एक दूसरे पर फोड़ रही हैं। इन विवादों का बड़ा असर मोदी सरकार की छवि पर तो हुआ ही, लेकिन साथ ही अपने आधिकारों को लेकर आम जनता के बीच संशय की स्थिति पैदा हो गई है।

महंगाईः देशवासियों को अच्छे दिन का नारा देकर सत्ता में आई मोदी सरकार के शासन में महंगाई एक अहम मुद्दा रहा है। आए दिन की जरूरतों वाले सामान की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी ने आम जनता की जेब का बोझ काफी भारी कर दिया है। फिर चाहे बात पैट्रोल-डीजल की कीमतों की हो या खाने की वस्तुओं की, हर तरह के सामान की कीमतों पर पहले के मुकाबले काफी बढौतरी दर्ज की गई है। जबकि जनता की उम्मीदें इससे ठीक विपरित थीं। हालांकि महंगाई का मुद्दा कोई नया नहीं है, एनडीए सरकार से पहले यूपीए के कार्यकाल में भी महंगाई एक अहम मसला रहा है। लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में जनता को स्थिति बदलने की उम्मीद अधिक थी, क्योंकि इन्हीं मुद्दों को भुनाकर एनडीए सत्ता में आई थी।

डिजीटल इंडियाः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी अभी कर के कार्यकाल के दौरान डिजीटल इंडिया को खासी अहमियत दी है और देश की अधिकतर संस्थाओं का डिजिटलीकरण हो भी चुका है। इसमें बड़े बैंकों से लेकर गावों में चलने वाले राशन डिपो अब डिजीटल तरीके से चल रहे हैं। बेशक मोदी सरकार की इस पहले देश को दुनिया के बाकी देशों की जमात में लाकर खड़ा कर दिया है, लेकिन देश का सीनियर सिटीजन वर्ग इस वजह से परेशानी भी झेल रहा है। उन्हें बैंकों व अन्य संस्थानों में किसी भी फोर्मेलिटी के लिए दूसरों भी निर्भर होना पड़ा है। दूसरे शब्दों में कहें तो देश को कुछ ही समय में पूरी तरह से डिजीटल करना कई फायदे तो लेकर आया है, लेकिन सीनियर वर्ग अभी इसके लिए तैयार नहीं था और उसका नुकसान भी मोदी सरकार को कहीं न कहीं चुकाना पड़ा सकता है।